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भारतीय इतिहास, राजनीति और समाज-सुधार के फलक पर कुछ ऐसे दस्तावेज और माध्यम दर्ज हैं, जिन्होंने महज सूचनाओं के आदान-प्रदान से कहीं अधिक बढ़कर एक पूरे समाज की चेतना को जगाने, उसे वैचारिक रूप से परिपक्व करने और सत्ता के गलियारों में उसके अधिकारों की गूंज पैदा करने का ऐतिहासिक कार्य किया है। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा संचालित और संपोषित पत्रकारिता इसी महान परंपरा का सबसे प्रामाणिक और जीवंत प्रमाण है। आधुनिक भारत में जब मुख्यधारा का प्रेस या तो कुलीन वर्ग के हाथों की कठपुतली था अथवा सामाजिक असमानता और वर्णव्यवस्था का संरक्षक बना हुआ था, तब डॉ. अम्बेडकर ने यह भली-भांति समझ लिया था कि बिना अपने स्वतंत्र प्रेस के, शोषितों और अछूतों का मुक्ति आंदोलन पंखहीन पक्षी के समान है। इसी वैचारिक और राजनीतिक आवश्यकता से मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1927), समता और अंतत: जनता (1930) जैसे समाचार पत्रों का जन्म हुआ। इन सभी प्रकाशनों में जनता का वर्ष 1940 का अंक और इस कालखंड का वैचारिक सफर भारतीय सामाजिक न्याय की पत्रकारिता का वह मील का पत्थर है, जिस पर आज का आधुनिक और समतावादी भारत अपनी वैचारिक नींव की तलाश करता है।
नाम परिवर्तन का महान राजनीतिक व दार्शनिक संदेश: बहिष्कृत से जनता तक
जनता समाचार पत्र के इतिहास और उसके 1940 के ऐतिहासिक स्वरूप को समझने से पहले इसके नामकरण के उस गहरे दार्शनिक और राजनीतिक निहितार्थ को समझना अनिवार्य है, जो डॉ. अम्बेडकर ने इसके प्रकाशन के समय तय किया था। डॉ. अम्बेडकर ने 24 नवंबर 1930 को इस पाक्षिक समाचार पत्र की शुरूआत की थी। इससे पहले उनके द्वारा निकाले जाने वाले पत्र का नाम बहिष्कृत भारत था। बहिष्कृत भारत नाम उस समाज की उस त्रासदी का परिचायक था, जिसे सदियों से मानवीय समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था, जिसे अछूत मानकर बस्तियों के बाहर धकेल दिया गया था। परंतु 1930 के दशक तक आते-आते, विशेषकर गोलमेज सम्मेलनों की पूर्वसंध्या पर और देश भर में दलितों के अंदर राजनीतिक चेतना के उभार के साथ, डॉ. अम्बेडकर ने इस मानसिकता को बदलना आवश्यक समझा। पत्र का नाम बहिष्कृत से बदलकर जनता कर देना कोई यांत्रिक या प्रशासनिक निर्णय नहीं था। यह एक वैचारिक घोषणा थी कि अब भारत के अछूत और शोषित वर्ग स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़ा गया कोई बहिष्कृत या दया का पात्र समूह नहीं मानते हैं। वे इस राष्ट्र की मुख्यधारा की जनता हैं। वे इस देश के नागरिक हैं और देश की संपदा, शासन, विधान तथा संसाधनों में उनकी उतनी ही स्वाभाविक और वैधानिक हिस्सेदारी है, जितनी किसी अन्य सवर्ण या उच्च वर्ग के नागरिक की। जनता नाम ने शोषितों के भीतर से हीनभावना के उस अंधकार को हमेशा के लिए मिटा दिया, जो शताब्दियों से उनके मन में भर दिया गया था। वर्ष 1940 तक आते-आते जनता अखबार इस वैचारिक संघर्ष का सबसे मुखर और लोकप्रिय राष्ट्रीय मंच बन चुका था, जहाँ देश भर के दलित, शोषित, मजदूर और किसान अपनी उम्मीदों और अधिकारों का अक्स देखते थे।
राजनीतिक उथल-पुथल और भारतीय दलित आंदोलन
वर्ष 1940 का कालखंड न केवल भारतीय इतिहास का, बल्कि संपूर्ण विश्व के इतिहास का सबसे संकटग्रस्त और परिवर्तनकारी दौर था। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) पूरी अपनी विभीषिका के साथ दुनिया को अपनी चपेट में ले चुका था। ब्रिटिश सरकार ने बिना भारतीयों से पूछे भारत को युद्ध में झोंक दिया था, जिसके विरोध में कांग्रेस ने अपने प्रांतीय मंत्रिमंडलों से इस्तीफा दे दिया था। देश के भीतर मुस्लिम लीग अपने द्विराष्ट्र के सिद्धांत को धार दे रही थी, और हिंदू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्तर पर राष्ट्रवाद की अपनी परिभाषाएं गढ़ रहे थे। ऐसे जटिल और भंवर भरे माहौल में, भारत के अछूतों (जिन्हें उस समय आधिकारिक रूप से डिप्रेस्ड क्लासेज या शिड्यूल्ड कास्ट्स कहा जाता था) के राजनीतिक भविष्य का सवाल सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा था। मुख्यधारा की कांग्रेस पार्टी और उसके नेता यह दावा करते थे कि वे ही संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं, और अछूतों के अलग अधिकारों की मांग देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को कमजोर कर रही है। इसके विपरीत, डॉ. अम्बेडकर और उनकी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (तथा आगे चलकर शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की ओर बढ़ती हुई राजनीतिक धारा) का यह स्पष्ट मत था कि जिस स्वतंत्रता में अछूतों और मजदूरों की सामाजिक व राजनीतिक मुक्ति की गारंटी न हो, वह स्वतंत्रता वास्तविक स्वतंत्रता नहीं हो सकती। वर्ष 1940 में जनता समाचार पत्र ने इसी अंतर्विरोध को देश के सामने सबसे बड़े आईने की तरह पेश किया। जनता का यह वर्ष राजनीतिक विश्लेषण, वैचारिक स्पष्टता और युद्धकालीन परिस्थितियों में दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति का एक ऐसा दस्तावेज था, जिसने यह साबित कर दिया कि शोषित वर्ग अब किसी के राजनीतिक रहमो-करम पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह अपनी राजनीतिक ताकत खुद गढ़ रहा है।
जनता का संपादन, संचालन और संपादकीय नीति
किसी भी समाचार पत्र की आत्मा उसके संपादकों, लेखकों और उसके पीछे काम करने वाली वैचारिक टीम की निष्ठा में बसती है। जनता अखबार का संचालन और संपादन भले ही सीधे तौर पर डॉ. अम्बेडकर के मार्गदर्शन में होता था, किंतु इसके प्रत्यक्ष संपादन और प्रबंधन की जिम्मेदारी देवराव नाईक, बी. आर. कदरेकर, जी. एन. सहस्रबुद्धे और पी. के. सावंत जैसे समर्पित और प्रखर अंबेडकरी विचारकों व कार्यकतार्ओं के कंधों पर थी। ये सभी वे लोग थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सत्ता या पद की लालसा के बिना, केवल और केवल समाज-सुधार और बहुजन पत्रकारिता को समर्पित कर दिया था। जनता की संपादकीय नीति बेहद स्पष्ट, निर्भीक और दो टूक थी। यह पत्र कभी भी चापलूसी या कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल नहीं करता था। यदि कांग्रेस पार्टी या उसके नेता महात्मा गांधी दलितों के उद्धार के नाम पर महज हरिजन सेवक संघ जैसी दान-पुण्य की प्रणालियों के जरिए सामाजिक बदलाव को रोकना चाहते थे, तो जनता अपने संपादकीयों में सप्रमाण यह साबित करता था कि दलितों को दया या भिक्षा नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी, नागरिक अधिकार और सामाजिक बराबरी चाहिए। जनता के पन्नों में छपने वाले लेख, समीक्षाएं और समाचार केवल महाराष्ट्र या मुंबई प्रांत तक सीमित नहीं थे, बल्कि बंगाल, पंजाब, मद्रास, संयुक्त प्रांत और सेंट्रल प्रोविंसेज तक के अछूतों पर होने वाले अत्याचारों, उनके सम्मेलनों, उनकी मांगों और उनके संघर्षों को मुखर स्थान देते थे। 1940 के आसपास जनता का प्रसार देश के कोने-कोने तक हो चुका था, और यह अनपढ़ या अल्पशिक्षित दलित बस्तियों में भी किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति द्वारा पढ़कर सुनाया जाता था, जो अपने आप में एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका था।
1940 के विशेषांक और प्रमुख वैचारिक सरोकार
वर्ष 1940 में जनता अखबार ने अपने प्रकाशन के सफर के जो आयाम छुए और उस वर्ष जितने भी महत्वपूर्ण अंक व विशेषांक प्रकाशित हुए, उन्होंने भारतीय समाज सुधार के इतिहास में एक नया मानक स्थापित किया। 1940 के इन अंकों का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो उसमें निम्नलिखित प्रमुख वैचारिक सरोकार और विषय प्रखरता से उभरकर सामने आते हैं:
स्वतंत्र राजनीतिक अस्मिता की अनिवार्यता: 1940 के अंकों में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया कि अछूतों को किसी भी सामान्य राजनीतिक दल की पिछलग्गू या वोट बैंक इकाई नहीं बनना चाहिए। कांग्रेस या अन्य सवर्ण-प्रधान दलों के भीतर रहकर दलित कभी भी अपनी मुक्ति के लिए स्वतंत्र नीति नहीं बना सकते। इसलिए, अपनी खुद की स्वतंत्र राजनीतिक ताकत का निर्माण ही एकमात्र विकल्प है।
शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन का संदेश: जनता केवल राजनीतिक कोरे नारे नहीं गढ़ता था, बल्कि वह समाज के भीतरूनी सुधारों पर भी भारी बल देता था। 1940 के अंकों में बार-बार इस बात की अपील की गई कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों और कॉलेजों में भेजें। शिक्षा को डॉ. अम्बेडकर के उस प्रसिद्ध मंत्र—‘शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पिएगा वह दहाड़ेगा’ के रूप में घर-घर पहुँचाने का माध्यम जनता ही था। इसके साथ ही, पारंपरिक गंदे और अपमानजनक व्यवसायों से निकलकर आधुनिक उद्योगों, तकनीकी क्षेत्रों और सरकारी सेवाओं में प्रवेश पाने के लिए युवाओं को प्रेरित किया गया।
श्रमिकों और किसानों के अधिकारों की पैरोकारी: चूंकि डॉ. अम्बेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के माध्यम से मजदूरों और किसानों के अधिकारों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया था, इसलिए जनता अखबार केवल दलित जातियों तक सीमित नहीं था। यह भारत के समस्त सर्वहारा वर्ग—चाहे वह किसी भी जाति का गरीब मजदूर हो—का मुखपत्र था। 1940 के दौर में मिल मालिकों और जमींदारों द्वारा मजदूरों का जो भीषण शोषण किया जा रहा था, उसके खिलाफ हड़तालों, संघर्षों और श्रम कानूनों की माँग को जनता ने अपने पृष्ठों पर प्रमुखता से जगह दी।
सामंती और ब्राह्मणवादी व्यवस्था की वैचारिक आलोचना: जनता के स्तंभों में हिंदू धर्म के भीतर मौजूद असमानता के मूल कारणों, शास्त्रों और स्मृतियों के उस विधान पर गहरी और तार्किक चोट की जाती थी, जो शूद्रों और अछूतों को गुलाम बनाए रखने का समर्थन करता था। यह आलोचना किसी व्यक्तिगत द्वेष पर आधारित न होकर वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय और मानवाधिकार के दृष्टिकोण पर टिकी होती थी।
भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में जनता का अद्वितीय स्थान: यदि हम 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं सदी के मध्य तक के भारतीय प्रेस के इतिहास का सिंहावलोकन करें, तो हमें दो स्पष्ट धाराएं दिखाई देंगी। पहली धारा वह थी जिसे मुख्यधारा का राष्ट्रवादी प्रेस कहा जाता है (जिसका संचालन अधिकांशत: उच्च जातियों और संभ्रांत वर्गों द्वारा किया जाता था)। इस प्रेस का मुख्य एजेंडा ब्रिटिश साम्राज्य से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था, लेकिन इसके भीतर भारतीय समाज की सबसे बड़ी बीमारी—यानी जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता—के प्रति या तो आपराधिक मौन था या फिर उसका परोक्ष समर्थन। दूसरी धारा वह थी जिसे बहुजन पत्रकारिता या शोषित वर्ग की पत्रकारिता कहा जाता है, जिसकी नींव महात्मा ज्योतिराव फुले के सत्यशोधक समाज के दौर से पड़ी और जिसे महात्मा गांधी के हरिजन (जिसे डॉ. अम्बेडकर सवर्णों द्वारा अछूतों के पैटरनाइजिंग टूल मानते थे) के बरक्स डॉ. अम्बेडकर के मूकनायक, बहिष्कृत भारत और जनता ने अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचाया। जनता समाचार पत्र इस दूसरी धारा का सबसे परिपक्व और धारदार प्रतीक था। यह विशुद्ध रूप से जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता के पैसों से (चंदे और सहयोग से) चलने वाला अखबार था। इसमें बड़े-बड़े विज्ञापनदाताओं का कोई दबाव नहीं होता था, और न ही किसी पूंजीपति का वित्तीय नियंत्रण होता था। यही कारण है कि इसकी भाषा में वह अकृत्रिम और बेबाक सच्चाई होती थी, जो बड़े अखबारों के एयरकंडीशंड दफ्तरों से कभी पैदा नहीं हो सकती। 1940 का जनता अखबार इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि कैसे एक अखबार ने बिना किसी सरकारी मदद या कारपोरेट बैकिंग के, केवल वैचारिक प्रतिबद्धता के बल पर करोड़ों बेजुबानों को जुबान दे दी।
जनता से प्रबुद्ध भारत तक की यात्रा और ऐतिहासिक निरंतरता: जनता समाचार पत्र की यह महान यात्रा 1940 के दशक के बाद भी अनवरत चलती रही। इस अखबार ने भारत की स्वतंत्रता (1947) को देखा, भारत के संविधान के निर्माण (1949-1950) और उसमें सामाजिक न्याय के प्रावधानों को मूर्त रूप लेते हुए देखा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और अन्य समानतावादी अनुच्छेदों को आकार देने में जो वै?ि भूमिकानिभायी, उसकी बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार करने में जनता अखबार के संपादकीयों और लेखों का बहुत बड़ा योगदान था। समय चक्र आगे बढ़ा। डॉ. अम्बेडकर के जीवन का अंतिम पड़ाव आया जब उन्होंने भारतीय समाज की सड़ी-गली व्यवस्था को त्यागकर अपने लाखों अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। अपने जीवन के उस अंतिम और सबसे क्रांतिकारी कदम से ठीक कुछ महीने पहले, 4 फरवरी 1956 को, डॉ. अम्बेडकर ने जनता समाचार पत्र के नाम को एक बार फिर बदला। उन्होंने जनता का नाम बदलकर प्रबुद्ध भारत रख दिया। नाम परिवर्तन का यह अंतिम चरण इस बात का प्रतीक था कि अब अछूत और शोषित वर्ग केवल जनता (राजनीतिक प्रजा या नागरिक) तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बुद्ध के धम्म और आधुनिक ज्ञान के प्रकाश से प्रबुद्ध (एल्ल’्रॅँ३ील्ली)ि हो चुका है। हालांकि, भले ही 1956 में इसका नाम प्रबुद्ध भारत हो गया, किंतु 1930 से लेकर 1956 के बीच के उस लंबे सफर में—विशेषकर 1940 के उस निर्णायक दशक में—जनता नाम से जो वैचारिक यज्ञ इस देश में रचा गया था, उसने भारतीय सामाजिक न्याय की पत्रकारिता के इतिहास में जो लकीर खींच दी, वह अमर हो गई।
निष्कर्ष: संक्षेप में कहा जाए तो, वर्ष 1940 का जनता समाचार पत्र और उसका संपूर्ण प्रकाशन काल महज कागजों और स्याही का इतिहास नहीं है। यह भारत के करोड़ों दलितों, वंचितों, मजदूरों और शोषितों के आत्मसम्मान, बौद्धिक विकास और राजनीतिक अधिकारों की वह संघर्ष-गाथा है, जिसने देश के सबसे बड़े लोकतंत्र की परिभाषा को बदलकर रख दिया। आज जब हम 21वीं सदी के भारत में खड़े होकर मीडिया, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के अंत:संबंधों की समीक्षा करते हैं, तो जनता अखबार का हर एक पन्ना हमें यह याद दिलाता है कि पत्रकारिता का वास्तविक धर्म सत्ता की चापलूसी करना नहीं, बल्कि समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोछना और उसे उसकी शक्ति का अहसास कराना है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा जनता के माध्यम से जलाई गई वह मशाल आज भी हर उस पत्रकार, विचारक और नागरिक के मार्ग को रोशन कर रही है, जो एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और स्वतंत्र भारत के निर्माण के सपने को अपनी आँखों में संजोए हुए है।





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