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संसार के विभिन्न धर्मों में विवाह को लेकर अपनी-अपनी अवधारणाएं हैं। पारंपरिक हिंदू व्यवस्था में विवाह को एक ‘धार्मिक संस्कार’ माना गया है, जिसमें अग्नि के फेरे, सिंदूर, मंगलसूत्र और कई घंटों तक चलने वाले वैदिक मंत्रोच्चार प्रमुख होते हैं। इसके विपरीत, बौद्ध परंपरा में विवाह कोई अलौकिक या जन्म-जन्मांतर का बंधन नहीं, बल्कि दो परिपक्व व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति, समानता और सम्मान पर आधारित एक सामाजिक अनुबंध है। बौद्ध विवाह में अग्नि साक्षी, सात फेरे, सिंदूर, मंगलसूत्र या कुंडली मिलान का कोई स्थान नहीं होता।
सिंदूर और मंगलसूत्र क्यों नहीं? बौद्ध दर्शन किसी भी ऐसे प्रतीक को खारिज करता है जो स्त्री के ऊपर पुरुष के स्वामित्व या पितृसत्तात्मक अधीनता को दशार्ता हो। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने अपनी रचनाओं में स्पष्ट किया था कि बाल विवाह और महिलाओं पर थोपे गए कड़े वैवाहिक नियम जाति व्यवस्था की सीमाओं को सुरक्षित रखने की उपज थे। बौद्ध विवाह में स्त्री को स्वतंत्र और समान दर्जा दिया जाता है, इसलिए यहां स्वामित्व सूचक प्रतीकों की आवश्यकता नहीं होती।
श्वेत वस्त्रों की महत्ता: जहां कई परंपराओं में विवाह के लिए चटक लाल या पीले रंग को ही शुभ माना जाता है, वहीं बौद्ध विवाह में वर-वधू प्राय: श्वेत (सफेद) या हल्के रंग के शालीन वस्त्र पहनते हैं। बौद्ध दर्शन में श्वेत रंग सादगी, पवित्रता, मानसिक शांति और पंचशील के पालन का प्रतीक है। बौद्ध विवाह की प्रक्रिया अत्यंत सरल, सुरुचिपूर्ण और वैज्ञानिक सोच पर आधारित होती है।
वेदी की स्थापना: मंच पर तथागत बुद्ध और बोधिसत्व डॉ. बी. आर. आंबेडकर की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है।
दीप व पुष्प अर्पण: वर-वधू और उपस्थित लोग तथागत के समक्ष दीप, मोमबत्ती व धूप प्रज्वलित कर पुष्प अर्पित करते हैं।
त्रिशरण और पंचशील: किसी भिक्षु या बौद्ध धम्मचारी की उपस्थिति में वर-वधू तथा सभी उपस्थित लोग बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि (त्रिशरण) और सदाचार के पांच नियम (पंचशील) ग्रहण करते हैं।
प्रतिज्ञाएं (सिगालोवाद सुत्त पर आधारित): बौद्ध विवाह का सबसे महत्वपूर्ण भाग ‘प्रतिज्ञा ग्रहण’ है। दीर्घ निकाय के सिगालोवाद सुत्त में बुद्ध द्वारा गृहस्थ जीवन के लिए बताए गए परस्पर कर्तव्यों के आधार पर वर और वधू एक-दूसरे के प्रति निष्ठा, सम्मान, आर्थिक पारदर्शिता और सम्यक आजीविका की प्रतिज्ञाएं लेते हैं।
माला अर्पण और मंगल कामना: प्रतिज्ञाओं के बाद वर-वधू एक-दूसरे को जयमाला पहनाते हैं। इसके बाद उपस्थित जनसमूह महामंगल सुत्त या जयमंगल अठ्ठगाथा के सस्वर पाठ द्वारा उन पर पुष्प वर्षा कर मंगल कामना करता है। अंत में वर-वधू को विवाह प्रमाण-पत्र सौंपा जाता है।
कन्यादान नहीं, बल्कि समर्पण और सहभागिता: पारंपरिक विवाहों में ‘कन्यादान’ का विधान होता है, परंतु बौद्ध परंपरा इसका कड़ा विरोध करती है।
●बौद्ध दर्शन के अनुसार, संतान (पुत्री) कोई निर्जीव वस्तु या संपत्ति नहीं है जिसका किसी को दान किया जा सके।
●दान देने के बाद दानदाता का वस्तु पर अधिकार समाप्त माना जाता है, जबकि एक पुत्री का अपने माता-पिता और मायके से संबंध जीवन भर प्राकृतिक और आत्मीय बना रहता है।
●इसीलिए बौद्ध व्यवस्था में इसे ‘दान’ न कहकर दो स्वतंत्र व्यक्तियों का ‘पारस्परिक समर्पण’ और दो परिवारों का सौहार्दपूर्ण मिलन माना जाता है।
मुहूर्त और अंधविश्वास से परे: बौद्ध जीवनशैली में राहुकाल, भद्रा, लग्न या ज्योतिषीय मुहूर्त का कोई महत्व नहीं है। विवाह की तिथि वर-वधू और दोनों परिवारों की आपसी सहमति तथा सार्वजनिक अवकाश (जैसे रविवार या गजेटेड हॉलिडे) को देखकर तय की जाती है, ताकि सगे-संबंधियों को आने-जाने में असुविधा न हो। बौद्ध संस्कृति धन के अपव्यय (फिजूलखर्ची) और दिखावे का विरोध करती है। अत्यधिक गर्मी, भारी बरसात या कड़ाके की ठंड से बचते हुए अनुकूल मौसम में सादे समारोह आयोजित किए जाते हैं। बुद्ध पूर्णिमा, धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस या वषार्वास के प्रमुख पर्वों के दिन विहारों में धार्मिक आयोजन अधिक होने के कारण विवाह के लिए सामान्य दिनों को प्राथमिकता दी जाती है।
निष्कर्ष: बौद्ध विवाह पद्धति यह दर्शाती है कि जीवन के सबसे महत्वपूर्ण संस्कार को अंधविश्वास, गैर-बराबरी, आर्थिक बोझ और जटिल पुरोहितवाद के बिना भी कितनी गरिमा और पवित्रता के साथ संपन्न किया जा सकता है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आधुनिक युग के अनुकूल समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का सजीव उदाहरण है।
आंबेडकरवादी बौद्ध परंपरा में विवाह को विशेष रूप से समानता और सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति के दृष्टिकोण से देखा जाता है। इसलिए कई विवाहों में जाति-आधारित रीति-रिवाज, दहेज और अनावश्यक कर्मकांड से बचते हुए बुद्ध-धम्म के सिद्धांतों पर प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं।





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