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पेरियार ई.वी. रामासामी और जस्टिस पार्टी का कायापलट

द्रविड़ कड़गम के रूप में नए युग का शंखनाद
News

2026-08-22 14:19:57

भारतीय सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान आंदोलन और द्रविड़ राजनीति के इतिहास में वर्ष 1944 एक ऐसा महापरिवर्तनकारी मोड़ है, जिसने दक्षिण भारत की वैचारिक और राजनीतिक धुरी को हमेशा के लिए बदल दिया। दक्षिण भारत के महान समाज सुधारक और पेरियार के नाम से विश्वविख्यात इरोड वेंकटप्पा रामासामी (ई.वी. रामासामी) के नेतृत्व में मद्रास प्रेसीडेंसी के सलेम जिले में आयोजित जस्टिस पार्टी का ऐतिहासिक अधिवेशन इस बात का गवाह बना कि कैसे एक पुरानी, अभिजात वर्ग की राजनीतिक पार्टी ने अपनी पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर खुद को एक आम जनमानस के क्रांतिकारी सामाजिक आंदोलन में रूपांतरित कर लिया। इसी अधिवेशन में दक्षिण भारतीय उदार महासंघ, जिसे सामान्य बोलचाल में जस्टिस पार्टी कहा जाता था, का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम करने का वह ऐतिहासिक फैसला लिया गया, जिसने आगे चलकर तमिलनाडु और दक्षिण भारत की संपूर्ण राजनीतिक संस्कृति को एक नई दिशा दी।

जस्टिस पार्टी की पृष्ठभूमि और उसकी ऐतिहासिक सीमाएं

जस्टिस पार्टी की स्थापना 20 नवंबर 1916 को मद्रास प्रेसीडेंसी में डॉ.सी. नटेश मुदलियार, पी. त्यागराज चेट्टी, डॉ.टी.एम. नायर और राजा रामारायणडिगर जैसे गैर-ब्राह्मण बुद्धिजीवियों, जमींदारों और व्यापारियों द्वारा की गई थी। उस दौर में मद्रास प्रेसीडेंसी की शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका और राजनीतिक जीवन पर कुल आबादी के एक बहुत छोटे हिस्से यानी ब्राह्मण समुदाय का लगभग संपूर्ण एकाधिकार था। सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में गैर-ब्राह्मणों (जो कुल आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक थे) की भारी उपेक्षा हो रही थी। इसी व्यवस्थागत अन्याय के खिलाफ जस्टिस पार्टी ने आवाज उठाई और गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण (कम्युनल गवर्नमेंट आॅर्डर) की मांग की। जस्टिस पार्टी के दबाव के कारण ही मद्रास सरकार ने 1921 और 1927 में ऐतिहासिक सरकारी आदेश पारित किए, जिनके तहत सरकारी नौकरियों में गैर-ब्राह्मण जातियों को उनका हक मिलना शुरू हुआ। यद्यपि जस्टिस पार्टी ने सामाजिक न्याय की दिशा में यह एक बड़ी और शुरूआती सफलता हासिल की थी, परंतु इसकी अपनी कुछ अंतर्निहित सीमाएं और कमजोरियां थीं:

1. अभिजातवर्गीय चरित्र: जस्टिस पार्टी के शुरूआती नेता मुख्य रूप से धनी जमींदार, मिल मालिक, राजा-महाराजा और उच्च पदस्थ गैर-ब्राह्मण थे। यह पार्टी आम गरीब, दलित, और बहुजन किसानों-मजदूरों की सीधी पार्टी न होकर एक अभिजात वर्गका संगठन अधिक थी।

2. ब्रिटिश राज के प्रति निष्ठा: अपने गठन के शुरूआती दशकों में जस्टिस पार्टी ब्रिटिश हुकूमत की वफादार बनी रही, क्योंकि उसे लगता था कि ब्रिटिश शासन ही ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ गैर-ब्राह्मणों को सुरक्षा कवच प्रदान कर सकता है।

3. सीमित वैचारिक दायरा: यह पार्टी मुख्य रूप से नौकरियों में हिस्सेदारी और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व तक सीमित थी; यह हिंदू धर्म के भीतर मौजूद वर्णव्यवस्था, जातिगत असमानता और अंधविश्वासों पर सीधा और कड़ा प्रहार करने से हिचकिचाती थी।

आत्मसम्मान आंदोलन

जब जस्टिस पार्टी अपनी वैचारिक सीमाओं में जकड़ी हुई थी, तब मद्रास की राजनीति में पेरियार ई.वी. रामासामी का आगमन हुआ। पेरियार ने कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे ब्राह्मणवादी वर्चस्व और पक्षपात को देखकर 1925 में कांग्रेस छोड़ दी थी। कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने तमिलनाडु की धरती पर आत्मसम्मान आंदोलन की शुरूआत की। पेरियार का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है जब तक कि मनुष्य को सामाजिक और मानसिक गुलामी से मुक्ति न मिले। उन्होंने जाति व्यवस्था, छुआछूत, धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और अंधविश्वासों के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने तर्क दिया कि दक्षिण भारत के मूल निवासी द्रविड़ हैं और आर्यों (ब्राह्मणों) द्वारा रचित धार्मिक ग्रंथों व संस्कृति ने यहाँ के बहुजनों को मानसिक रूप से गुलाम बना रखा है। 1930 के दशक तक आते-आते पेरियार का आत्मसम्मान आंदोलन दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली जन-आंदोलन बन चुका था, जिसमें मजदूर, किसान, महिलाएं और युवा बड़ी संख्या में जुड़ने लगे थे।

जस्टिस पार्टी और पेरियार का संगम

1930 के दशक के उत्तरार्ध तक आते-आते जस्टिस पार्टी का राजनीतिक प्रभाव कम होने लगा था। 1937 के मद्रास प्रेसीडेंसी के चुनावों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और सरकार बनाई। कांग्रेस सरकार ने आते ही स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य कर दिया, जिसके खिलाफ पेरियार ई.वी. रामासामी और जस्टिस पार्टी ने मिलकर एक ऐतिहासिक हिंदी विरोधी आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति की दिशा बदल दी। हिंदी विरोध के दौरान पेरियार और जस्टिस पार्टी के नेता पहली बार एक साझा मंच पर आए। जस्टिस पार्टी के नेताओं (जिन्होंने तमिल भाषा और द्रविड़ अस्मिता के सवाल पर पेरियार का समर्थन किया था) को यह अहसास हो गया कि बिना पेरियार के जन-आधार और उनकी क्रांतिकारी वैचारिकी के, यह पार्टी मृतप्राय हो जाएगी। वर्ष 1938 में जस्टिस पार्टी ने पेरियार ई.वी. रामासामी को अपना सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुन लिया। यह एक गैर-ब्राह्मण अभिजात पार्टी द्वारा एक आम जन-क्रांतिकारी नेता को सौंपे जाने वाला सबसे बड़ा नेतृत्व था। पेरियार के अध्यक्ष बनते ही जस्टिस पार्टी का चरित्र पूरी तरह से बदलने लगा। अब यह पार्टी केवल नौकरियों में कोटे की बात करने वाला संगठन नहीं रही, बल्कि वह एक पूर्णकालिक समाज सुधार और वैचारिक क्रांति का मंच बन गई।

1944 का सलेम अधिवेशन: पेरियार के नेतृत्व में आने के बाद जस्टिस पार्टी के भीतर इस बात पर लगातार मंथन चल रहा था कि पार्टी के पुराने, दबे-कुचले और रूढ़िवादी स्वरूप को पूरी तरह से त्याग दिया जाए। इसी उद्देश्य से 27 और 28 अगस्त 1944 को सलेम जिले में जस्टिस पार्टी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता स्वयं पेरियार ई.वी. रामासामी ने की थी। इस सम्मेलन में सी. अन्नादुरै (अण्णा) और अन्य युवा नेताओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। अधिवेशन में पेरियार ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया:

नाम परिवर्तन: पार्टी का पुराना नाम दक्षिण भारतीय उदार महासंघ (जस्टिस पार्टी) औपनिवेशिक काल और अभिजात वर्ग की याद दिलाता था, इसलिए इसे पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए। पार्टी का नया और क्रांतिकारी नाम द्रविड़ कड़गम रखा जाए, जिसका शाब्दिक अर्थ है—द्रविड़ संगठन।

चुनी हुई राजनीति से अलगाव: पेरियार ने प्रस्ताव रखा कि द्रविड़ कड़गम अब किसी भी ब्रिटिश या भारतीय चुनाव प्रक्रिया में भाग नहीं लेगा और न ही सरकार बनाएगा। यह पार्टी कोई पारंपरिक चुनावी राजनीतिक दल नहीं रहेगी, बल्कि यह एक पूर्ण सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक सुधार आंदोलन के रूप में कार्य करेगी। इसका एकमात्र उद्देश्य द्रविड़ समाज को ब्राह्मणवादी वर्चस्व, अंधविश्वास और गुलामी से मुक्त कराना होगा।

स्वतंत्र द्रविड़ देश की मांग: इस अधिवेशन में दक्षिण भारत के चार भाषाई राज्यों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक) को मिलाकर एक स्वतंत्र, संप्रभु द्रविड़नाडु के गठन का प्रस्ताव भी पारित किया गया, जो उत्तर भारतीय राजनीतिक और सांस्कृतिक आधिपत्य का विरोध करेगा।

सलेम के इस अधिवेशन में भारी बहुमत के साथ इन सभी प्रस्तावों को मंजूरी दे दी गई। जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम कर दिया गया। यह निर्णय केवल एक पार्टी का नाम बदलना नहीं था, बल्कि यह एक नए वैचारिक युग का शंखनाद था।

द्रविड़ कड़गम का भारतीय राजनीति पर प्रभाव

1944 में सलेम अधिवेशन में लिए गए इस फैसले ने भारतीय राजनीतिक और सामाजिक इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। इसके निम्नलिखित दूरगामी परिणाम सामने आए:

चुनावी राजनीति से दूरी और समाज सुधार: पेरियार ने खुद को चुनावी राजनीति से अलग कर लिया और द्रविड़ कड़गम को एक ऐसा सामाजिक प्रहरी बना दिया जिसने तमिलनाडु के घर-घर में जातिवाद, पाखंड और धार्मिक अंधविश्वासों के खिलाफ आत्मसम्मान विवाह (बिना पुरोहितों और कर्मकांड के विवाह) और मंदिर प्रवेश जैसे अभियान चलाए।

द्रविड़ राजनीति का उदय (डीएमके और एआईएडीएमके का जन्म): हालांकि पेरियार स्वयं चुनावी राजनीति के खिलाफ थे, परंतु उनके युवा और तेज-तर्रार सहयोगी सी. अन्नादुरै की सोच थोड़ी अलग थी। अन्नादुरै का मानना था कि समाज सुधार के साथ-साथ सत्ता की ताकतों पर कब्जा करना भी जरूरी है। इसी वैचारिक मतभेद के चलते 1949 में सी. अन्नादुरै ने द्रविड़ कड़गम से अलग होकर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके-द्रमुक) की स्थापना की। आगे चलकर इसी डीएमके और उससे निकली एआईएडीएमके ने तमिलनाडु की सत्ता पर ऐसा कब्जा जमाया कि वहाँ की कांग्रेस और राष्ट्रीय पार्टियां हाशिए पर चली गईं।

सामाजिक न्याय और आरक्षण की परिपक्वता: द्रविड़ कड़गम और उसकी वैचारिक संतान (डीएमके-एआईएडीएमके) ने तमिलनाडु में सामाजिक न्याय की नींव को इतना मजबूत किया कि आज भी तमिलनाडु देश का वह राज्य है जहाँ सबसे मजबूत आरक्षण प्रणाली (लगभग 69 प्रतिशत) लागू है और वहाँ की सामाजिक संरचना देश के अन्य हिंदी भाषी राज्यों की तुलना में अधिक समतावादी और प्रगतिशील मानी जाती है।

निष्कर्ष: वर्ष 1944 में पेरियार ई.वी. रामासामी की अध्यक्षता में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम करना महज एक संगठनात्मक औपचारिकता नहीं थी। यह एक सड़े-गले, सामंती और अभिजातवर्गीय संगठन का पुनर्जन्म था, जिसने बहुजन समाज को अपनी असली पहचान और राजनीतिक ताकत का अहसास कराया। पेरियार के उस दूरदर्शी फैसले ने दक्षिण भारत को एक नई वैचारिक दृष्टि दी, जिसने साबित कर दिया कि जब तक समाज में मानसिक गुलामी और असमानता मौजूद है, तब तक राजनीतिक आजादी अधूरी है; और द्रविड़ कड़गम के रूप में जो बीज 1944 में बोया गया था, उसने आने वाले दशकों में तमिल समाज की पूरी कायापलट कर दी।

आज की सामाजिक स्थिति बहुजन वैचारिकी के महान नायक माननीय ई वी रामास्वामी जी के संकल्प, देश से ब्राह्मणवाद को समाप्त करने की याद दिलाते हैं।

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2024-01-13 16:38:05