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आधुनिक भारत के निर्माता, महान संविधानवेत्ता और सामाजिक क्रांति के अग्रदूत बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर 20वीं सदी के उन विरल महामानवों में से थे, जिनका जीवन ज्ञान, संघर्ष और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना को समर्पित रहा। वे केवल एक राजनेता, विधिवेत्ता या अर्थशास्त्री ही नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे युगांतरकारी शिक्षाशास्त्री थे जिन्होंने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का मुख्य हथियार बनाया। बाबासाहेब की शैक्षणिक योग्यता विश्व इतिहास में अद्वितीय है। उन्होंने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों, घोर जातिगत भेदभाव और आर्थिक अभावों को मात देकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों से उच्चतम डिग्रियाँ प्राप्त कीं:
➢कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क (अमेरिका): एम.ए., पीएच.डी.
➢लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स, लंदन (ब्रिटेन): एम.एससी., डी.एससी.
➢ग्रेज इन, लंदन (ब्रिटेन): बार-एट-लॉ
➢मानद उपाधियाँ: उस्मानिया विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा एलएल.डी.
वे न केवल अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, कानून, राजनीति विज्ञान, दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, नृवंशशास्त्र, इतिहास और धर्मशास्त्र के मूर्धन्य विद्वान थे, बल्कि अंग्रेजी, मराठी, हिंदी, गुजराती, संस्कृत, पाली, फारसी, फ्रेंच, जर्मन और उर्दू जैसी अनेक भाषाओं के प्रकांड ज्ञाता भी थे। उनकी बौद्धिक क्षमता का लोहा पूरी दुनिया ने माना। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपने 250वें स्थापना वर्ष के अवसर पर उन्हें विश्व के शीर्ष 100 विद्वानों में प्रथम स्थान देते हुए ‘ज्ञान का प्रतीक’घोषित किया और संस्थान के पुस्तकालय के प्रांगण में उनकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की। यह सम्मान प्राप्त करने वाले वे अकेले भारतीय हैं। बाबासाहेब का स्पष्ट मानना था कि सदियों से चली आ रही सामाजिक दासता, अस्पृश्यता और गैर-बराबरी की जड़ें अज्ञानता में हैं। उन्होंने समाज को तीन अमर सूत्र दिए: शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।
शिक्षा से जुड़े बाबा साहेब के प्रमुख विचार:
शेरनी का दूध: बाबासाहेब प्राय: कहते थे—‘शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा।’ अर्थात् शिक्षा व्यक्ति में स्वाभिमान, साहस और चेतना का संचार करती है।
ब्राह्मणवाद की जड़ पर प्रहार: उनका दृढ़ मत था—‘‘ब्राह्मणवाद उनके ज्ञान पर नहीं, बल्कि हमारी अज्ञानता पर टिका हुआ है।’’ ज्ञान का प्रकाश ही शोषण के अंधकार को मिटा सकता है।
स्त्री शिक्षा और समानता: डॉ. अम्बेडकर किसी भी समाज के विकास का पैमाना वहाँ की महिलाओं की प्रगति से मापते थे। उन्होंने लड़के और लड़कियों दोनों के लिए उच्च शिक्षा की अनिवार्यता पर बल दिया।
डॉ. अम्बेडकर ने बिना कोई हथियार उठाए, बिना हिंसा का मार्ग अपनाए और केवल अपनी अगाध बौद्धिक क्षमता, तर्क और संवैधानिक प्रावधानों के बल पर करोड़ों शोषितों, वंचितों और महिलाओं को मानवीय अधिकार और सम्मान दिलाया।
शैक्षिक संस्थानों के निर्माण की पृष्ठभूमि: 1942 से 1946 के दौरान जब डॉ. अम्बेडकर वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम, सिंचाई और विद्युत मंत्री थे, तब उन्होंने वंचित वर्ग के 16 प्रतिभाशाली छात्रों को राजकीय छात्रवृत्ति पर उच्च तकनीकी और अकादमिक शिक्षा के लिए इंग्लैंड और अन्य देशों में भिजवाया। किंतु वे जानते थे कि व्यक्तिगत प्रयासों से सीमित संख्या में ही छात्र लाभान्वित हो सकते हैं। उस समय के तत्कालीन शिक्षण संस्थानों में बहुजन व वंचित वर्ग के विद्यार्थियों के साथ घोर जातिगत भेदभाव होता था—उन्हें कक्षाओं के बाहर बैठाया जाता था, पीने के पानी से वंचित किया जाता था और छात्रावासों में प्रवेश नहीं दिया जाता था। बाबासाहेब ने अनुभव किया कि जब तक शोषित समाज के अपने संस्थान नहीं होंगे, जहाँ बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों और धर्मों के बच्चों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा मिल सके, तब तक समाज का वास्तविक पुनरुत्थान असंभव है।
पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना: दलितों और समाज के सभी उपेक्षित वर्गों में उच्च शिक्षा के प्रसार के उद्देश्य से बाबासाहेब ने 8 जुलाई 1945 को बम्बई (अब मुंबई) में ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की। इस संस्था का संविधान, विजन और संचालन नियम स्वयं बाबासाहेब ने तैयार किए। संस्था का ध्येय वाक्य था: ‘प्रज्ञा, शील और करुणा’। 20 जून 1946 को इस संस्था के अधीन मुंबई में सिद्धार्थ कॉलेज की स्थापना की गई, जिसने निम्न और मध्यम वर्ग के कामकाजी युवाओं के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोल दिए।
मिलिंद कॉलेज, औरंगाबाद की स्थापना: मुंबई में सिद्धार्थ कॉलेज की सफलता के बाद बाबासाहेब का ध्यान महाराष्ट्र के सर्वाधिक पिछड़े और सामंती शोषण से ग्रस्त क्षेत्र मराठवाड़ा (जो उस समय हैदराबाद के निजाम रियासत का हिस्सा रहा था) की ओर गया। उस समय पूरे मराठवाड़ा में उच्च शिक्षा का एक भी प्रतिष्ठित केंद्र नहीं था और छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए हैदराबाद या नागपुर जाना पड़ता था। डॉ. अम्बेडकर ने इस महाविद्यालय का नाम प्रसिद्ध इंडो-ग्रीक राजा मिनांडर प्रथम के नाम पर ‘मिलिंद कॉलेज’ रखा। राजा मिलिंद और बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच हुए दार्शनिक संवाद पर विश्वप्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मिलिंदपन्हो (मिलिंद पनहा - मिलिंद के प्रश्न) आधारित है। बाबासाहेब चाहते थे कि यह कॉलेज केवल डिग्री बांटने की जगह न बने, बल्कि यह तर्क, संवाद, प्रज्ञा और बौद्धिक विमर्श का वैश्विक केंद्र बने।
कालक्रम और विकास:
19 जून 1950: मिलिंद महाविद्यालय की विधिवत शुरूआत हुई।
1 सितंबर 1951 (शिलान्यास): कॉलेज के स्थायी परिसर (नागसेनवन) की आधारशिला स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा रखी गई। डॉ. प्रसाद ने अपने भाषण में बाबासाहेब के इस प्रयास को राष्ट्र निर्माण का अनुपम उदाहरण बताया।
नागसेनवन परिसर: औरंगाबाद की छावनी के निकट फैली विशाल भूमि पर बाबासाहेब ने नागसेनवन नामक एक विशाल और सुंदर शैक्षणिक परिसर विकसित किया। यहाँ कला, विज्ञान, वाणिज्य और कानून की कक्षाओं के साथ-साथ विशाल छात्रावास और समृद्ध पुस्तकालय बनाए गए।
शिक्षण संस्कृति और बाबासाहेब का जुड़ाव
डॉ. अम्बेडकर के लिए मिलिंद कॉलेज केवल एक ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं था, बल्कि वह उनके सपनों की कर्मभूमि थी।
1. पुस्तकालय को प्राथमिकता: बाबासाहेब जब भी औरंगाबाद आते, वे कॉलेज के पुस्तकालय का निरीक्षण सबसे पहले करते थे। उन्होंने अपने व्यक्तिगत संग्रह से हजारों दुर्लभ और मूल्यवान पुस्तकें इस कॉलेज के पुस्तकालय को दान कीं।
2. छात्रों और अध्यापकों से संवाद: वे छात्रावासों में जाकर छात्रों से सीधे मिलते, उनके भोजन, रहने की व्यवस्था और पढ़ाई की जानकारी लेते। वे अध्यापकों को प्रेरित करते थे कि वे छात्रों में केवल रटने की आदत न डालें, बल्कि उनमें आलोचनात्मक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें।
3. अखिल भारतीय चरित्र: मिलिंद कॉलेज में केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु से भी वंचित वर्ग के छात्र शिक्षा ग्रहण करने आए। इस परिसर ने देश को सैकड़ों प्रशासनिक अधिकारी (आईएएस, आईपीएस), प्राध्यापक, साहित्यकार, वैज्ञानिक, वकील और राजनेता दिए।
1960 और 70 के दशक में मिलिंद कॉलेज (नागसेनवन परिसर) आधुनिक मराठी दलित साहित्य और सामाजिक चेतना का सबसे बड़ा गढ़ बनकर उभरा। नामदेव ढसाल, जे. वी. पवार, बाबूराव बागूल, दया पवार जैसे कालजयी साहित्यकारों और विचारकों की वैचारिक जड़ें इसी परिसर से जुड़ी रहीं। 1972 में स्थापित ऐतिहासिक क्रांतिकारी संगठन दलित पैंथर्स की वैचारिक ऊर्जा का मुख्य केंद्र मिलिंद कॉलेज का नागसेनवन परिसर ही था। इस परिसर ने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जिसने साहित्य, संस्कृति और राजनीति में सदियों से स्थापित सामंती वर्चस्व को खुली चुनौती दी। जब मराठवाड़ा में विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार आया, तो बाबासाहेब ने 1950 के दशक में ही इसके लिए जोरदार पैरवी की थी। 1958 में औरंगाबाद में मराठवाड़ा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, जिसके निर्माण में मिलिंद कॉलेज और नागसेनवन परिसर के संसाधनों का ऐतिहासिक योगदान रहा। आगे चलकर, इस क्षेत्र में बाबासाहेब के अभूतपूर्व शैक्षिक और सामाजिक योगदान को मान्यता दिलाने के लिए 1978 से 1994 तक 16 वर्षों तक ऐतिहासिक नामांतर आंदोलन चला। अनगिनत सामाजिक कार्यकतार्ओं, छात्रों और नागरिकों के लंबे लोकतांत्रिक संघर्ष और बलिदान के बाद, 14 जनवरी 1994 को महाराष्ट्र सरकार ने इस विश्वविद्यालय का नाम विस्तारित कर ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय’ किया। मिलिंद कॉलेज पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी के अंतर्गत संचालित एक ऐतिहासिक स्वायत्त महाविद्यालय के रूप में आज भी नागसेनवन में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है, जबकि विश्वविद्यालय समूचे क्षेत्र का केंद्रीय प्रशासनिक उच्च शिक्षा संस्थान है।
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने मिलिंद कॉलेज और पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी के माध्यम से यह सिद्ध कर दिखाया कि शिक्षा ही सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी क्रांति है। उन्होंने शोषितों के हाथों में कलम और ज्ञान की शक्ति थमाकर उन्हें आत्मसम्मान से सिर उठाकर जीने का मार्ग दिखाया। आज मिलिंद कॉलेज और नागसेनवन परिसर केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समता और प्रबुद्ध भारत के निर्माण का एक पवित्र ऐतिहासिक तीर्थ है। बाबासाहेब का जीवन और उनका शैक्षिक मिशन आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का एक प्रकाशस्तंभ बना हुआ है।





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