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सच्ची देशभक्त और भारत की वीर राजमाता जीजाबाई

News

2026-06-13 14:06:39

भारतीय इतिहास के पन्नों में जब भी मातृशक्ति, राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस और दूरदर्शिता का उल्लेख होता है, तो सबसे पहला और सबसे वंदनीय नाम राजमाता जिजाऊ (जिजाबाई भोसले) का आता है। वे केवल छत्रपति शिवाजी महाराज की माता नहीं थीं, बल्कि वे उस महान हिन्दवी स्वराज्य की वास्तविक संकल्पनाकार थीं, जिसने सदियों की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर भारतीय जनमानस में स्वतंत्रता और स्वाभिमान के बीज बोए।

प्रारंभिक जीवन: राजमाता जिजाऊ का जन्म 12 जनवरी 1598 को महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के सिंदखेड राजा नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम लखुजीराव जाधव और माता का नाम म्हालसाबाई था। लखुजीराव जाधव निजामशाही दरबार के एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रमुख मराठा सरदार थे। जाधव घराने को देवगिरी के प्राचीन यादव राजवंश का वंशज माना जाता है। जिजाऊ ने अपना बचपन तलवारों की खनक और युद्ध की रणनीतियों के बीच बिताया। वे बचपन से ही अत्यंत कुशाग्र बुद्धि, निडर और स्वाभिमानी थीं। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी और कूटनीति की शिक्षा अपने पिता की देखरेख में प्राप्त की। राजनीति और कूटनीति के दांव-पेंच उन्होंने बचपन में ही समझ लिए थे। वर्ष 1605 में, कम उम्र में ही जिजाऊ का विवाह वेरुल (एलोरा) के शूरवीर मराठा सरदार मालोजीराव भोसले के पुत्र शहाजीराजे भोसले के साथ कर दिया गया। यह विवाह दौलताबाद के किले में अत्यंत भव्य तरीके से संपन्न हुआ शहाजीराजे भी एक महान पराक्रमी योद्धा थे। विवाह के बाद जिजाऊ का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। राजनीतिक परिस्थितियों के कारण निजामशाही दरबार में उनके पिता लखुजीराव जाधव और पति शहाजीराजे भोसले के बीच गहरे मतभेद और शत्रुता पैदा हो गई। एक स्त्री के लिए यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति थी कि उसके मायके और ससुराल वाले एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे। 1629 में दौलताबाद के किले में निजामशाह ने धोखे से लखुजीराव जाधव और जिजाऊ के भाइयों की निर्मम हत्या करवा दी। इस घटना ने जिजाऊ के हृदय को छलनी कर दिया। इस दुखद घटना ने जिजाऊ की आंखें खोल दीं। उन्होंने गहराई से महसूस किया कि मराठे कितने भी वीर क्यों न हों, इन विदेशी सुल्तानों के दरबार में उनकी हैसियत केवल गुलामों की है। सुल्तान जब चाहें उन्हें खिलौने की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब चाहें उन्हें मार देते हैं। इसी दिन जिजाऊ ने यह अटल संकल्प लिया कि वे इस गुलामी को समाप्त करेंगी और मराठों का अपना एक स्वतंत्र राज्य (स्वराज्य) स्थापित करेंगी, जहाँ अपनी जनता, अपना धर्म और अपनी संस्कृति सुरक्षित हो।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म

शहाजीराजे लगातार मुगलों, निजामशाही और आदिलशाही के खिलाफ युद्धों में व्यस्त रहते थे। जब जिजाऊ गर्भवती थीं, तब महाराष्ट्र में चारों ओर युद्ध का माहौल था। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शहाजीराजे ने उन्हें जुन्नर के पास स्थित अभेद्य शिवनेरी किले पर भेज दिया। शिवनेरी किले पर जिजाऊ ने कठोर तपस्या की। वे किले की अधिष्ठात्री देवी शिवाई माता से प्रार्थना करती थीं कि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो उनके स्वराज्य के अधूरे स्वप्न को पूरा कर सके और दुष्टों का विनाश कर सके। 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी किले में जिजाऊ ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। शिवाई देवी के नाम पर उस बालक का नाम शिवाजी रखा गया। (जिजाऊ को कुल 8 संतानें हुई थीं, जिनमें से 6 पुत्रियों का बचपन में ही निधन हो गया था। उनके दो पुत्र बचे—बड़े पुत्र संभाजी (जो शहाजीराजे के साथ रहे) और छोटे पुत्र शिवाजी (जो जिजाऊ के साथ रहे)।)

शिवाजी महाराज को महान छत्रपति बनाने का पूरा श्रेय राजमाता जिजाऊ के लालन-पालन और उनके द्वारा दिए गए संस्कारों को जाता है। जिजाऊ ने बाल शिवाजी को केवल लोरियां नहीं सुनाईं, बल्कि उन्हें वीर गाथाएं सुनाईं। उन्होंने सुनिश्चित किया कि शिवाजी को हर प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण मिले। इसके साथ ही राजनीति, कूटनीति, न्याय व्यवस्था और प्रशासन की गहरी शिक्षा भी उन्होंने स्वयं शिवाजी को दी। जिजाऊ ने शिवाजी के मन में यह बात गहराई से बैठा दी कि उन्हें किसी सुल्तान की चाकरी नहीं करनी है, बल्कि अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराना है। उन्होंने शिवाजी को सभी जातियों और वर्गों को साथ लेकर चलने की प्रेरणा दी।

पुणे का नवनिर्माण

शहाजीराजे को बीजापुर के आदिलशाह ने कर्नाटक की जागीर दे दी थी। उन्होंने जिजाऊ और बाल शिवाजी को उनके विश्वसनीय मंत्री दादोजी कोंडदेव के साथ पुणे की जागीर में भेज दिया। जब जिजाऊ पुणे पहुँचीं, तो वहाँ की स्थिति अत्यंत भयावह थी। आदिलशाही के सरदार मुरार जगदेव ने पुणे को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था और वहाँ गधों का हल चलवाकर यह शाप दे दिया था कि जो भी इस भूमि पर बसेगा, उसका विनाश हो जाएगा। लोगों के मन से इस अंधविश्वास और डर को निकालने के लिए, जिजाऊ ने स्वयं पहल की। उन्होंने पुणे की बंजर और शापित मानी जाने वाली भूमि पर सोने का हल चलवाया। इससे किसानों में एक नया विश्वास जागा और वे वापस अपने गाँवों को लौटने लगे। जिजाऊ ने पुणे में अपने रहने के लिए लाल महल का निर्माण करवाया, जो बाद में स्वराज्य की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। जिजाऊ केवल घर तक सीमित नहीं थीं। वे पुणे में बकायदा अपनी अदालत (न्याय सभा) लगाती थीं। वे किसानों के जमीन के विवाद सुलझाती थीं, अपराधियों को कठोर दंड देती थीं और गरीबों की सहायता करती थीं। उनका न्याय इतना निष्पक्ष होता था कि लोग उन्हें साक्षात देवी मानने लगे थे।

स्वराज्य के संघर्ष में जिजाऊ की प्रत्यक्ष भूमिका और कूटनीति

शिवाजी महाराज द्वारा स्वराज्य की स्थापना के दौरान जितने भी महत्वपूर्ण और संकटपूर्ण प्रसंग आए, उन सभी में राजमाता जिजाऊ एक ढाल बनकर खड़ी रहीं। जब 16 वर्षीय शिवाजी ने स्वराज्य का पहला तोरण बांधते हुए तोरणा किला जीता, तो जिजाऊ ने उन्हें स्वयं तिलक लगाकर युद्ध के लिए विदा किया था। वे हमेशा शिवाजी को अपनी सीमाएं विस्तार करने के लिए प्रेरित करती थीं। जब बीजापुर के आदिलशाह ने शहाजीराजे भोसले को धोखे से बंदी बना लिया, तो शिवाजी महाराज क्रोध में आदिलशाही पर हमला करना चाहते थे। लेकिन जिजाऊ ने उन्हें शांत किया। उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए मुगल सम्राट शाहजहां से पत्र व्यवहार करवाया। मुगलों के दबाव और कूटनीति का उपयोग करते हुए, बिना कोई बड़ा युद्ध लड़े शहाजीराजे को आदिलशाह की कैद से सुरक्षित रिहा करवा लिया। बीजापुर का सबसे खूंखार सेनापति अफजल खान जब शिवाजी महाराज को मारने के लिए भारी सेना लेकर आया, तो स्वराज्य के कई बड़े मंत्रियों ने शिवाजी को सुलह करने की सलाह दी। लेकिन जिजाऊ जानती थीं कि अफजल खान ने उनके बड़े बेटे संभाजी की भी धोखे से हत्या की थी। जिजाऊ ने शिवाजी से कहा, शिवबा, यह सुलह का समय नहीं है। अफजल खान एक विषैला सांप है, और सांप का फन कुचलना ही धर्म है। यदि तुम स्वराज्य के लिए वीरगति को भी प्राप्त हुए, तो मैं रोऊंगी नहीं। इसी प्रेरणा ने प्रतापगढ़ के युद्ध में अफजल खान का पेट फाड़ने के लिए शिवाजी महाराज को शक्ति प्रदान की। स्वराज्य के महान योद्धाओं, जैसे बाजीप्रभू देशपांडे और तानाजी मालुसरे, के लिए जिजाऊ एक माता के समान थीं। जब तानाजी अपने बेटे रायबा की शादी छोड़कर कोंढाणा (सिंहगढ़) किला जीतने गए, तो यह जिजाऊ का ही आदेश और स्वराज्य के प्रति उनका प्रेम था जिसने उन्हें अपना बलिदान देने के लिए प्रेरित किया।

आगरा संकट के दौरान स्वराज्य का संचालन

शिवाजी महाराज के जीवन का सबसे बड़ा संकट तब आया जब मुगल सम्राट औरंगजेब ने उन्हें आगरा में धोखे से नजरबंद कर लिया। जब शिवाजी महाराज आगरा की कैद में थे, तब महाराष्ट्र में स्वराज्य पूरी तरह से नेतृत्वविहीन हो गया था। यह वह समय था जब मुगलों और आदिलशाही को लगा कि अब वे स्वराज्य को आसानी से निगल जाएंगे। इस घोर संकट के समय में 70 वर्ष की आयु के करीब पहुँच चुकी राजमाता जिजाऊ ने स्वराज्य की बागडोर पूरी तरह अपने हाथों में ले ली। उन्होंने लगभग आठ महीनों तक स्वराज्य का प्रशासन, सेना का मनोबल, और दुश्मनों से सीमाओं की रक्षा इतनी कुशलता से की कि एक इंच भी जमीन दुश्मनों के हाथ नहीं लगने दी। जब शिवाजी महाराज और बाल शंभाजी आगरा से सफलतापूर्वक बचकर वापस राजगढ़ पहुँचे, तो जिजाऊ की आँखों में खुशी के आंसू थे। यह जिजाऊ के कुशल प्रशासन का ही परिणाम था कि स्वराज्य सुरक्षित रहा।

महापरिनिर्वाण

शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के मात्र 11 दिन बाद ही राजमाता जिजाऊ ने अनुभव किया कि उनका इस धरती पर कार्य पूर्ण हो चुका है। बुढ़ापे और शारीरिक थकान के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। 17 जून 1674 को रायगढ़ किले की तलहटी में स्थित पाचाड नामक गाँव में राजमाता जिजाऊ ने अपनी अंतिम सांस ली और अनंत में विलीन हो गईं। उनका यह महापरिनिर्वाण पूरे स्वराज्य के लिए एक अपूरणीय क्षति था। छत्रपति शिवाजी महाराज, जो किसी भी बड़े संकट में नहीं रोए थे, अपनी माता के निधन पर फूट-फूट कर रोए थे। पाचाड में ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की गई, जहाँ आज भी उनकी पावन समाधि स्थित है और लाखों लोग वहाँ नतमस्तक होने जाते हैं।

राजमाता जिजाऊ केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं; वे एक जीवंत विचार और प्रेरणा का असीम स्रोत हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि एक माँ केवल बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि वह एक पूरे राष्ट्र के भाग्य का निर्माण कर सकती है। यदि जिजाऊ न होतीं, तो शायद भारत को कभी छत्रपति शिवाजी महाराज जैसा शूरवीर और युगपुरुष नहीं मिलता। 17वीं सदी में जब महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित माना जाता था, तब जिजाऊ ने राजनीति, प्रशासन, न्याय प्रणाली और युद्ध रणनीति का सफल संचालन करके यह साबित कर दिया कि महिलाएँ किसी से कम नहीं हैं। अनेक व्यक्तिगत त्रासदियों (पिता और पुत्रों की हत्या, पति से दूरी) को झेलने के बावजूद वे कभी टूटी नहीं, बल्कि उन्होंने अपने दुखों को अपनी ताकत बनाया। आज के आधुनिक भारत को राजमाता जिजाऊ के आदर्शों की अत्यधिक आवश्यकता है।

17 जून (राजमाता जिजाऊ स्मृति दिवस) का दिन हमें उनके उस महान बलिदान और संकल्प की याद दिलाता है, जिसके कारण हम आज एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी देश में सांस ले रहे हैं। स्वराज्य की इस महान जननी के चरणों में कोटि-कोटि नमन!

Ichharam Anuragi, Uttar Pradesh
Jay kori smaj
2026-06-17 16:22:40
 
 
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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

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18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05